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जानिए कंधार विमान अपहरण पर क्या था अटल बिहारी वाजपेयी का फैसला

जानिए कंधार विमान अपहरण पर क्या था अटल बिहारी वाजपेयी का फैसला

नई दिल्ली: अटल बिहारी वाजपेयी जब देश के प्रधानमंत्री थे, तो एक घटना ऐसी घटी की पूरी दुनिया की नजर भारत सरकार पर टिकी हुईं थी। वो घटना थी इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी-814 का अपहरण। वो एक ऐसा दौर था, जब सात दिनों की बातचीत और तमाम कोशिशों के बाद भारत सरकार ने अपने यात्रियों से भरे विमान को सकुशल मुक्त कराने के लिए तीन कुख्यात आतंकियों को रिहा कराया था। वो दिन शायद अटल बिहारी वाजपेयी के लिए बहुत मुश्किलभरे दिन थे।

 

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बता दें कि 24 दिसंबर 1999 का दिन था। इंडियन एयरलाइंस की फ्लाईट आईसी-814 ने काठमांडू, नेपाल के त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए उड़ान भरी थी। विमान में कुल मिलाकर 180 यात्री और क्रू मेंबर सवार थे। विमान एयरबस ए300 था। जैसे ही विमान करीब शाम के साढे 5 बजे भारतीय हवाई क्षेत्र में दाखिल हुआ, तभी बंदूकधारी आतंकियों ने विमान का अपहरण कर लिया और वे विमान को अमृतसर, लाहौर और दुबई होते हुए कंधार, अफगानिस्तान ले गए।

 

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कंधार जाने से पहले जब विमान को संयुक्त अरब अमीरात यानी दुबई में उतारा गया था, तब अपहरणकर्ताओं ने 176 यात्रियों में से 27 को दुबई में छोड़ दिया था। उन यात्रियों में ज्यादातर महिलाएं और बच्चे शामिल थे। वहीं रुपेन कात्याल नामक एक घायल यात्री को भी उतारा गया था। जिसे आतंकियों ने विमान में चाकू मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया था। बाद में रुपेन की मौत गई थी।

 

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उस वक्त अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत थी। उनके बारे में भारत को कम जानकारी थी। लिहाजा भारतीय अधिकारियों और अपहरणकर्ताओं के बीच बातचीत मुश्किल हो रही थी। तालिबान ने भारत की स्पेशल फोर्स को विमान पर हमला करने से रोकने की पूरी तैयारी कर ली थी। तालिबान के सशस्त्र लड़ाकों ने अपहृत विमान को चारों तरफ से घेर कर सुरक्षित कर रखा था।

 

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उस समय तालिबान को भारत ने मान्यता नहीं दी थी। और न ही अंतरराष्ट्रीय पटल पर तालिबान का कोई वजूद था। लिहाजा तालिबानी अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने की एक कोशिश के मद्देनजर भारतीय अधिकारियों का सहयोग करने के साथ-साथ अपहरणकर्ताओं और भारत सरकार के बीच मध्यस्थता करने की सहमति दे दी। भारत ने भी इस्लामाबाद में अपने उच्चायोग से एक अधिकारी को कंधार भेजा था।

 

 

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आपको बता दें कि अपहरणकर्ताओं ने शुरू में भारतीय जेलों में बंद 35 उग्रवादियों की रिहाई और 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर नगद देने की मांग की थी। इधर, भारत में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, गृह मंत्री लाल कृष्ण आड़वाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह समेत समूची सरकार आतंकियों की मांग पर विचार विमर्श कर रही थी। लेकिन आतंकी इससे कम पर मानने को तैयार नहीं थे।

 

अपहरण को दो दिन बीत चुके थे। पूरे देश की निगाहें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरफ लगी हुई थी। इसी बीच पीएम वाजपेयी को पता चला कि जमीयत उलेमा-ए-पाकिस्तान के सदर मौलाना फजर्लुरहमान की बात तालिबान बहुत मानता है। और मौलाना फजर्लुरहमान से भारत के मशहूर मदनी परिवार के सदस्य मौलाना असद मदनी से अच्छे संबंध हैं। पीएम वाजपेयी ने खुद अपना दूत भेजकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना असद मदनी से आग्रह किया कि वे मौलाना फजर्लुरहमान को मध्यस्थता करने के लिए कहें। असद मदनी पीएम का बहुत सम्मान करते थे। लिहाजा वे मौलाना फजर्लुरहमान से बात करने के लिए राजी हो गए।

 

वहीं इस दौरान तालिबान और भारत सरकार के अधिकारी लगातार अपहरणकर्ताओं के साथ बातचीत कर रहे थे। अब भारत सरकार के साथ-साथ आतंकियों पर भी दबाव बन रहा था। सरकार आतंकियों की कोई मांग नहीं मानना चाहती थी। लेकिन भारतीय यात्रियों की जान खतरे में थी। लिहाजा, सात दिन बाद यानी साल के आखरी दिन 31 दिसंबर 1999 को बातचीत रंग लाई। अपहरणकर्ता तीन कैदियों की रिहाई की मांग पर आकर मान गए। वार्ताकार उन्हें इस मांग तक मनाने में कामयाब रहे।

 

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वहीं समझौता होने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के विदेश मंत्री जसवंत सिंह खुद उन तीन कुख्यात आतंकियों को लेकर कंधार के लिए रवाना हो गए थे। वे कंधार हवाई अड्डे पर पहुंचे और वहां आतंकी मौलाना मसूद अजहर, अहमद ज़रगर और शेख अहमद उमर सईद को रिहा कर दिया गया। तीनों आतंकियों के रिहा होते ही विमान संख्या आईसी-814 में बंधक बनाए गए सभी यात्रियों को रिहा कर दिया गया।

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