मेघालय से पूरी तरह हटाया गया अफस्पा, अरुणाचल के कुछ हिस्सों से हटा

नई दिल्ली। देश के उत्तर पूर्व में स्थित मेघालय से विवादास्पद आर्म्ड  फोर्स स्पेशल पावर्स एक्ट को पूरी तरह से हटा दिया गया है। वहीं अरुणाचल प्रदेश के कई क्षेत्र से भी इस एक्ट को हटा दिया गया है। बता दें कि इस एक्ट के तहत देश के सुरक्षा बलों को इन राज्यों में विशेष अधिकार मिलते हैं, जिसका इस्तेमाल सुरक्षा बल उग्रवादियों को रोकने के लिए करते है। इसी को लेकर कई बार विरोध भी हो चुका हैं। यहीं नहीं इस एक्ट को हटाने के लिए शर्मिला चानु ने 16 साल तक अनशन भी किया था।

मेघालय की बात करे तो यहां सितंबर 2017 तक 40 फीसदी हिस्से में अफस्पा लागू था। इसको लेकर एक अधिकारी ने बताया कि राज्य सरकार के साथ बातचीत के बाद मेघालय से अफस्पा को पूरी तरह से हटाने का फैसला लिया गया है। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश के भी आठ पुलिस स्टेशनों में ही अब बस अफस्पा का प्रभार रह गया है, जबकि 2016 में ये 16 स्थानों पर विद्मान था। साथ ही गृह मंत्रालय ने पूर्वोत्तर में उग्रवादियों के लिए आत्मसमर्पण और पुनुर्वास नीती के तहत मदद राशि को 1 से बढ़ाकर 4 लाख कर दिया है।

केंद्र सरकार ने विदेशी नागरिकों की यात्रा को लेकर भी बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड जाने वाले विदेशियों के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र के परमिट और संरक्षित क्षेत्र के परमिट में ढील दे दी है। हालांकि ये पाबंदी कुछ देशों के लिए जारी रहेगी, जिसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और चीन शामिल है। आपको बता दें कि पिछले 4 वर्षों में क्षेत्र में उग्रवाद से संबंधित घटनाओं में 63 फीसदी की गिरावट देखी गई है।

गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि 2017 में नागरिकों की मौत में 83 फीसदी और सुरक्षा बलों के हताहत होने के आंकड़े में 40 फीसदी की कमी आई है। साल 2000 से तुलना की जाए तो साल 2017 में पूर्वोत्तर में उग्रवाद संबंधी घटनाओं में 85 फीसदी की कमी देखी गई है। वहीं, 1997 की तुलना में जवानों की मौत का आंकड़ा भी 96 फीसदी तक कम हुआ है। आपको बता दें कि आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर्स एक्ट सेना को जम्मू-कश्मीर और  पूर्वाोत्तर के विवादित इलाकों में सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार देता है।

इस एक्ट को लेकर काफी विवाद है और इसके दुरुपयोग का आरोप लगाकर लंबे समय से इसे हटाने की मांग की जाती रही है। अफस्पा का सेक्शन 4, सुरक्षा बलों को किसी भी परिसर की तलाशी लेने और बिना वॉरंट किसी को गिरफ्तार करने का अधिकार देता है। इसके तहत विवादित इलाकों में सुरक्षा बल किसी भी स्तर तक शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं। संदेह होने की स्थिति उन्हें किसी गाड़ी को रोकने, तलाशी लेने और उसे सीज करने का अधिकार होता है।

असम और मणिपुर राज्य की सरकारों के पास अब यह अधिकार है कि वे चाहें तो ऐक्ट को लागू रख सकती हैं या हटा सकती हैं।  सुरक्षा बलों का कहना है कि सबसे पहले 1958 में पूर्वोत्तर में विद्रोहियों से निपटने के लिए संसद की तरफ से लागू किया गया अफस्पा जवानों को जरूरी अधिकार देता है। उनके मुताबिक इस कानून की मदद से काफी खतरनाक स्थितियों में आतंकी या दूसरे खतरों से जूझ रहे जवानों को कार्रवाई में सहयोग मिलने के साथ-साथ सुरक्षा भी मिलती है।