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Valentine’s Day: 14 फरवरी को प्‍यार नहीं खौफ वाला दिन मानते हैं यहां के लोग   

Valentine’s Day: 14 फरवरी को प्‍यार नहीं खौफ वाला दिन मानते हैं यहां के लोग

14 फरवरी की तारीख सुनते ही लोगों को झट से प्‍यार वाला दिन यानी वैलेंटाइंस डे याद आ जाता है। 14 फरवरी को दुनियाभर में वैलेंटाइंस डे का सेलिब्रेशन चल रहा होता है तो वहीं, उत्‍तर प्रदेश के कई ऐसे गांव हैं जहां लोगों के मन में एक भय सा बना रहता है।

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अंक शास्‍त्र में 13 को भले ही मनहूस अंक माना जाता है, लेकिन यूपी के गोरखपुर और बस्‍ती मंडल के कुछ ऐसे गांव हैं, जहां 14 को मनहूस माना जाता है। इन गावों के युवाओं में 14 फरवरी को लेकर न कोई क्रेज होता है और न कोई इंतजार। आपको जानकर हैरान होंगे कि आखिर जब इन गांवों में आधुनिकता की रोशनी पहुंच चुकी है, तो फिर इस तरह अंधविश्वास क्यों है? तो आइए हम आपको इसके बारे में पूरी जानकारी देते हैं…

14 तारीख को नहीं होता कोई भी शुभ काम

उत्‍तर प्रदेश के गोरखपुर और बस्ती मंडल के कई ऐसे गांव हैं, जहां 14 अंक का भय बना रहता है। वैसे तो यह डर हिंदू कैलेंडर के चतुर्दशी से था, लेकिन कालांतर में यह 14 अंक से जुड़ गया। मीठाबेल, ब्रह्मपुर, चौरी, नेवास, घूरपाली, पैसोना और बलौली जैसे गांव के लोगों में 14 अंक का डर इस कदर है कि साल के किसी भी माह की 14 तारीख को कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता है। यहां तक कि अगर किसी दुकान पर आप 14 रुपये सामान खरीदते हैं तो या आपको 15 रुपये देने पड़ेंगे या फिर दुकानदार आपसे 13 रुपये ही लेगा।

इन गांवों में पढ़े-लिखों की कमी नहीं

ऐसा नहीं है कि इन गांवों के लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं बल्कि ब्राह्मण आबादी वाले इन गांवों के अधिकतर लोग ग्रेजुएट और पोस्‍ट ग्रेजुएट हैं। सिर्फ यही नहीं महिलाएं भी खूब पढ़ी-लिखी हैं, बावजूद इसके ये लोग 14 को मनहूस मानते हैं। मीठाबेल गांव में सेना से रिटायर कैप्‍टन आद्या प्रसाद दूबे अपना कैंप चलाते हैं, जिससे करीब 3500 युवाओं को भारतीय सेना और अर्धसैनिक बल में भेज चुके हैं। कैप्‍टन आद्या बताते हैं कि किसी को यह तक याद नहीं कि ये परंपरा कब से चली आ रही है, लेकिन मानते सभी हैं।

14 को क्‍यों मानते हैं मनहूस?

रिटायर कैप्‍टन आद्या के मुताबिक, कहा जाता है कि सदियों पहले गांव से सटा घना जंगल था, जिसका कुछ हिस्‍सा आज भी मौजूद है। इस जंगल में किसी कारण आग लग गई, जिससे पूरा गांव जलकर खाक हो गया। इस हादसे में गांव का कोई शख्‍स नहीं बच पाया, केवल एक महिला और उसके बच्‍चों को छोड़कर। क्‍योंकि उस समय वो महिला अपने बच्‍चों के साथ मायके गई हुई थी। बताया जाता है कि जिस दिन यह दर्दनाक हादसा हुआ, उस दिन 14 तारीख थी। उसके बाद से 14 तारीख को ही कुछ ऐसी घटनाएं घटीं, जिससे लोगों ने 14 अंक को मनहूस मान लिया। कैप्‍टन का कहना है कि समय के साथ लोगों की सोच भी बदली और परंपराएं भी टूटीं, लेकिन नहीं टूटी तो सदियों से चली आ रही ये रूढ़ी।

कई परिवारों के लिए मनहूस बनी 14 तारीख

एक बुजुर्ग रामानंद बताते हैं, ‘उनके पड़ोसी का बेटा दिल्‍ली के किसी प्राइवेट कंपनी में बड़े पद पर था। उस समय उसने गलती से 14 तारीख को ही नई कार खरीद ली थी। कार लेने के कुछ दिन बाद ही पूरा परिवार दिल्‍ली से उसी कार से कहीं जा रहा था और एक ट्रक ने कार को ऐसे रौंदा कि कोई नहीं बचा। 14 तारीख या चुतर्दशी के दिन ऐसे कई हादसे हुए हैं, जिससे हम लोग इसे मनहूस मानते हैं।’ वहीं, ब्रह्मपुर के कमलाकांत दूबे कहते हैं, ‘चाहे जनेऊ संस्कार हो या विवाह संस्कार हो, हम लोग किसी भी सूरत में 14 को नहीं मनाते हैं।’

गांव से दूर रहने वाले भी 14 तारीख से करते हैं परहेज

गांव के राधाकृष्ण दूबे बताते हैं, ‘किसी के बच्चे का जन्मदिन अगर किसी भी महीने की 14 तारीख को पड़ता है तो किसी की हिम्मत नहीं इस दिन कोई छोटी पार्टी भी रख ले। चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में ही क्यों न रहता हो।’ वहीं, असम के गुवाहाटी में खुद का व्‍यवसाय करने वाले मीठाबेल गांव के टंकेश्‍वर दूबे बताते हैं, ‘किसी भी महीने की 14 तारीख या यूं कहें चतुर्दशी को हम लोग शुभ काम नहीं करते हैं। गांव से हजारों किलोमीटर दूर रह रहा हूं, लेकिन इस बात का मुझे हमेशा ख्‍याल रखना पड़ता है।’

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