आपके विचार बनाते हैं आपका व्यक्तित्व

हर व्यक्ति अपना व्यक्तित्व विकास करना चाहता है, उसमें अपने स्वयं के व्यक्तित्व के विकास की क्षमता होनी चाहिए। अंतत मनुष्य अपने व्यक्तित्व का निर्माता स्वयं ही है। एक कहावत है कि मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है। आप अपने मन के स्वामी हैं, जैसा आप अपने बारे में सोचेंगे, वैसे आप बन जायेंगे। स्वयं में जिन भावों को स्थान देंगे उन भावों के परिणाम के पात्र भी आप ही होंगे। दुःख के भाव को आपने अपने मन में स्थान दिया है तो उसके पात्र भी आपको ही बनना होगा। फिर वह दुख की कामना का भाव भले ही शत्रु के लिए ही क्यों न हो। आपके सोच से आपकी भावना से शत्रु का कोई अहित हो, इसकी संभावनाएं काफी कम हैं। पर इस बात की शत-प्रतिशत संभावनाएं हैं कि दुख के जिस भाव के अंकुर आपके मन में फूटे हैं वे आपके जीवन में अवश्य ही साकार बनेंगे। आप सुख चाहते हैं आपको सुखी होने से कोई नहीं रोक सकता। शर्त है कि दुख के चिंतन को आप अपने हृदय में प्रवेश न होने दें। सुख का चिंतन आपको सुखी करेगा और दुख का चिंतन दुखी बनाएगा। फिर भले ही वह सुख या दुख का चिंतन आपके अपने लिए हो अथवा पर के लिए। स्मरण रखें, दूसरों के सुख का चिंतन भी आपको ही सुखी बनाएगा।

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जिसे तुम पाना चाह रहे हो, वह तुम्हारे भीतर विराजमान है। स्वयं-स्वयं के निकट आ जाओ, तुम उसे पा सकोगे जो पाना चाहते हो। अन्तर्यात्रा के बिना वह अब तक नहीं मिल सका जिसकी अभिलाषा है। कहते हैं-

काया मुरली बांस की, भीतर है आकाश।
उतरे अन्तर शून्य में, थिरके उर में रास।।

यह शरीर निश्चित रूप से बांस की मुरली जैसा है। उसमें से मधुर संगीत गुंजित हो सकता है। मुरली में आकाश है, रिक्तस्थान है। यदि उसे सही ढंग से बजाए जाए तो संगीत उत्पन्न होता है नहीं तो खाली खटारा ही है। ठीक यही स्थिति हमारी है। अपने अन्तरहृदय में प्रवेश कर उस लय को गुनगुनाया जा सकता है, जो संपूर्ण जीवन को लयमय बना दे, रसमय बना दे, सुखमय बना दे। अपेक्षा यह है कि कुछ सूत्रों को प्राप्त करके उनको प्रायोगिक रूप दिया जाए। भीतरी रहस्यों की परतों को खोला जाए। आवृत्त को अनावृत्त करना होगा। अपूर्णता को पूर्णता का पथ देना होगा और निर्मल व निर्भार बनकर आंतरिक अनुभव को जगाना होगा। वर्तमान को साक्षी बनाकर जीने वाला ही अन्तर्यात्रा की पात्रता प्राप्त कर सकता है। ज्ञाता-द्रष्टा भाव का विकास करके अंत स्तल की अतल गहराइयों में पहुंचा जा सकता है और भीतर छिपे ऊर्जा के अक्षय-स्रोत को प्राप्त किया जा सकता है। हेनरी वार्ड बीचर ने कहा है कि ईश्वर से जब हमें परेशानियां मिलती हैं, तब दरअसल वह हमें किसी अच्छी चीज के लिए तैयार कर रहा होता है।

जिस-जिस भाव के अंकुर आपमें पल्लवित और पुष्पित होते हैं वे भाव अपना फल अवश्य देते हैं। उन्हीं भावों से आपके जीवन का सृजन होता है। वाणी और व्यवहार में आपके विचार ही ढलते हैं। आप जिन भावों और विचारों से भरे हैं वे ही भाव और विचार आपका आचार बनते हैं। आपके भावों के अनुरूप ही आपको वातावरण और आसपास की परिस्थितियां प्राप्त होती हैं। आपका पूरा संसार आपके विचार का ही प्रतिबिम्ब है। आपके लिए इस जीवन और जगत में जो भी महत्पूर्ण से महत्वपूर्ण है वह आपका भाव ही है। आपके हृदय में बहने वाली भाव-सरिता आपकी सर्वाधिक मूल्यवान संपत्ति है। सुंदर, सुकोमल, सम्यक् भावों से यदि आपका हृदय भरा है तो आप सबसे बड़े समृद्ध हैं।

स्वर्ण कीचड़ में भी पड़ा हो तो उठा लिया जाता है, कीचड़ का विचार नहीं किया जाता, स्वर्ण के मूल्य पर विचार किया जाता है। ऐसे ही सद्विचार आपको जहां से भी मिले तत्क्षण उन्हें ग्रहण कर लो। एक छोटे से बालक से भी यदि कोई सीख मिलती है तो उसे ग्रहण कर लो। इस विचार में मत उलझो कि अरे यह बच्चा हमें क्या सिखाएगा। यह अहं भरा विचार है। और यह सतत स्मरण रखना चाहिए कि अहं हमारे हृदय पर एक चट्टान बनकर खड़ा हो जाता है। उसकी उपस्थिति में समस्त गुण अनुपस्थित हो जाते हैं।

महर्षि दत्रात्रेय का नाम आपने सुना होगा। उन्होंने अपने जीवन में अनेक पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों को अपना गुरु बनाया था। जिस भी पशु-पक्षी अथवा कीट-पतंगे में उन्हें कुछ श्रेष्ठ दिखाई दिया, उस श्रेष्ठ को उन्होंने ग्रहण कर लिया और जिससे भी उन्होंने कुछ श्रेष्ठ ग्रहण किया उसे ही उन्होंने अपना गुरु मान लिया। श्रेष्ठ विचार/भाव किसी की पैतृक संपत्ति नहीं है। जो उन्हें धारण कर लेता है वे उसी की संपत्ति बन जाते हैं। समता का भाव प्राप्त करना जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है। समता/समत्व भाव की परिभाषा गीता में निम्न शब्दों में की गई है-सुख दुःखे समे कृत्वा लाभालाभो जयाजयौ।

सुख-दुःख, लाभ-अलाभ और जय-पराजय में समान भावों को धारण करना ही साम्य भाव है। साम्यभाव की साधना एक श्रेष्ठतम साधना है। आपने बड़े-बड़े धनपति देखे होंगे, परन्तु उनको देखकर नहीं लगता कि वे धनपति हैं। क्योंकि उनके पास जो है वे उससे संतुष्ट नहीं है। बहुत संग्रह करके भी उन्हें लगता रहता है कि कोई अभाव है। वे अपने भीतर रिक्तता ही अनुभव करते रहते हैं।

मनुष्य की यह त्रासदी रही है कि वह सदा-सदा से शब्दों में उलझता रहा है। शब्दों के पीछे हुए भाव को वह पकड़ नहीं पाता। शब्दों को पकड़कर और शब्दों को हथियार बनाकर वह परस्पर टूटता रहा है, परस्पर लड़ता रहा है। मनुष्य बुद्धिमान उसी दिन कहलाएगा जिस दिन वह शब्द के बियावन से निकलकर भाव के जगत में प्रवेश करेगा।
ऊर्जा का एक नियम है कि वह सतत प्रवाहित रहती है। उसे मुट्ठी में बंद करके नहीं रखा जा सकता। जैसे आप वस्तुओं को स्टोर कर लेते हो कि भविष्य में काम आयेंगी, वैसा ऊर्जा के संबंध में नहीं किया जा सकता। मनुष्य में भी ऊर्जा है वह ऊर्जा यदि सृजन में लगती है। करुणा में बहती है, किसी की रक्षा में अर्पित होती है तो उसका मूल्य है। यदि ऊर्जा सृजनात्मक नहीं बन पाती तो विध्वंसात्मक बनेगी।

आप शक्ति के केन्द्र हैं, एक शक्ति के स्रोत हैं। उस ऊर्जा को आप अमृत भी बना सकते हैं और विष भी बना सकते हैं, उसे गीत भी बना सकते हैं और गाली भी दे सकते हैं। उसे प्रेम भी बना सकते हैं और घृणा भी बना सकते हैं। उसे क्या बनाते हैं यह आप पर निर्भर है। भगवान और शैतान कहीं बाहर नहीं है वे आप से ही प्रगट होते हैं। आपकी ऊर्जा यदि सृजनात्मक बनती है तो आपसे परमात्मा का जन्म होता है और यदि आपकी ऊर्जा विध्वंस में प्रवाहित होती है तो आप में से ही शैतान का जन्म होता है। अपने भीतर से परमात्मा को प्रगट करना चाहते हो तो अपनी ऊर्जा को निर्माण में लगाओ। अहिंसा में नियोजित करो, प्रेम और करुणा से अपने हृदय को भरो। तोड़ो मत, जोड़ने में रस देखो। कुछ ऐसा करो कि जो आपके लिए भी मंगलमय हो और दूसरों के लिए भी मंगलकारी हो। जो दुःखों से घिरे हैं उनको देखकर आपके भीतर संवेदना प्रवाहित होना चाहिए, कोई करुणा की धारा कोई प्रेम का स्रोत आपके भीतर फूटना चाहिए।

किसी दुखी को देखकर, किसी को कष्ट में घिरे देखकर यदि आपको यह नहीं लगता कि मैं स्वयं कष्ट में घिर गया हूं, किसी का कष्ट यदि आपके लिए अपना कष्ट नहीं बनता है और उसे कष्ट में देखकर भी आप अपने राह पर बढ़ जाते हैं तो समझ लीजिए कि धर्म, अध्यात्म, नैतिकता से आपका संबंध नहीं जुड़ा है। बेशक आपने अनेकों धर्म-ग्रंथ पढ़े हों, बेशक आप धर्म-चर्चा में सुंदर और सुदृढ़ तर्क प्रस्तुत करने में कुशल हो।

अब्राहम लिंकन अमेरिका के राष्ट्रपति थे। सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि एक राष्ट्रपति का जीवन कितना व्यस्त होता है। एक दिन वे सिनेट में भाषण देने जा रहे थे। रास्ते के किनारे एक डबरे में एक सूअर के बच्चे को डूबते हुए उन्होंने देखा। एक शिशु को मृत्यु-मुख में देखकर लिंकन का हृदय कांप उठा। उन्होंने तत्क्षण ड्राइवर को गाड़ी रोकने को कहा। गाड़ी रुकी। लिंकन कार से उतर कर झटपट उस सूअर के बच्चे के पास पहुंचे और अपनी हैसियत की परवाह न करते हुए, अपने कोट-पैंट की परवाह न करते हुए कि वे कीचड़ से भर जायेंगे, उन्होंने उस सूअर के बच्चे को कीचड़ से बाहर निकाल दिया।

लिंकन का समय भी बिगड़ा और वस्त्र भी कीचड़ से लथपथ हो गए। पर एक प्राणी के प्राण बचाकर उन्हें वैसा ही सुख मिला जैसा सुख उन्हें अपने प्राण बचने पर मिलता।
जितना हो सके दूसरों के लिए सुख बांटो क्योंकि इस संसार में उसके समान अन्य कोई धर्म नहीं है। किसी को पीड़ित मत करो, किसी का दिल मत दुखाओ, क्योंकि उसके समान अन्य कोई पाप नहीं है। इसी सन्दर्भ में टाल्सटाॅय ने कहा भी है किसी चीज को पाकर खुश हो जाना ही अच्छा नहीं है। यह भी जानना जरूरी है कि उसे पाया किस तरह गया है।
Lalit Garg (ललित गर्ग, 9811051133)