कहीं आंगन से विलुप्त ना हो जाए वो फुदकन

एक वक्त था जब उसकी आवाज से नींद खुल जाती थी, आंगन में वो आवाज सुनकर ही मन मदहोश हो उठता था। सूरत उगता था तब वो आती थी, शाम ढ़लती थी तब वो आती थी और दाना चुगकर चली जाती थी। माहौल को खुशनुमा करके सबके चेहरे पर मुस्कान छोड़ जाती थी लेकिन आज वो नहीं है, साल दर साल वो चहचहाट की आवाज कहीं गुम हो गई है। प्रदूषण और ऊंची इमारत के बीच वो छोटा सा परिंदा खोता सा जा रहा है।

जंगल खत्म होते जा रहे हैं, पक्के मकानों के कारण गौरैया का कुनबा या यूं कहें कि परिवार खत्म होता जा रहा है। जिस तरह से गौरैया खत्म होती जा रही है उसे देखकर तो यही लगता है कि वो आंगन जल्द ही सूने हो जाएंगे और गौरैया आंखों से ओझल हो जाएंगी।

आज के आधुनिक परिवेश में जो हालात हैं उस के बाद तो गौरैया शहरों से तो गायब हो ही गई है लेकिन गांव में भी एक या दो ही नजर आती है वो भी कुछ एक ही जगहों पर। ऐसा माना जाता है कि गौरैयों का असली घर किसी पेड़ या डाल पर नहीं बल्कि वो इंसानों के घर में ही एक कोना बनाकर रह लेती है लेकिन आज घर ही इतने संकुचित हो गए हैं कि लोग परिवार को अपने साथ नहीं रखना चाहते तो इन्हें जगह कैसे देंगे।

गौरैया के रहने के साथ-साथ खाने पर भी आफत हो गई है जिसके कारण ये मौत के मुंह में समा रही है। पहले जब महिलाएं खेत-खलिहानों और घर के मिट्टी के आंगन में गेंहू सुखाती तो इन्हें दाना चुगने के लिए मिल जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। कृषि प्रधान भारत में अब खेती को वो तवज्जों नहीं दी जा रही है लोग शहरों की ओर कूच कर गए हैं ताकि आधुनिकता के युग में प्रवेश कर सकें। ज्यादातर खेत खलियान सूख गए है। गांव की स्थिति तो खराब है ही शहरों का हाल तो उससे भी बदतर है। गौरैया कचरे के ढ़ेर में से दाना चुगने के लिए मजबूर है वो कचरा खाने के कारण बीमार हो रही है।

पहले के लोग घरों में रहते थे लेकिन आग लोग मकान में रहते हैं। मकान को खूबसूरत बनाने के लिए जो संगमरमर का इस्तेमाल किया जा रहा है वो मकान की खूबसूरती में चार चांद लगा रही है लेकिन उस चमक के पीछे जो कैमिकल है वो गौरैया की जीवनशैली को प्रभावित करती है। ऐसा माना जाता है टाइल्स को चमकाने के लिए जो फिनाइल का इस्तेमाल होता है उससे गौरैया की आंखें और उड़ान शक्ति खो देती हैं। यही नहीं, मोबाइल टावरों से निकलने वाली रेडियेशन भी इनके विलुप्त होने के प्रमुख कारणों में से एक है। रेडियेशन से गौरिया के प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है।

गत दिनों हुए एक सर्वे ये बात सामने निकलकर आई है कि कुछ ही सालों में गौरैया की संख्या 60 से 80 फीसदी कम हो गई है अगर जल्द ही इसे संरक्षित करने के लिए कोई उपाय नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी के लिए ये पक्षी इतिहास बन जाएगा। आपने हमने तो इसे देख लिया लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी सिर्फ इसे पढ़ पाएगी। ना तो वो मधुर आवाज सुन पाएगी, ना ही नन्हें से इस मासूम को देख पाएगी।

विश्व गौरैया दिवस पर नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान में सोमवार को ’सारस प्रेक्षागृह’ में ‘गौरैया हाउस’ दिवस मनाया गया। इस मौके पर छात्र-छात्राओं उपहार स्वरूप गौरैया का घोंसला दिया गया।

इस मौके पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक उमेन्द्र ने गौरैया के संरक्षण एवं उसके महत्व के बारे में बताते हुए इसके संरक्षण के लिए लोगों का जागरूक होना जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले तक हमारे घर-घर में, गांवों तथा छतों में बड़ी संख्या में गौरैया दिखायी देती थी। सुबह से ही चिड़ियों का चहकना शुरू हो जाता था, लेकिन विगत कुछ सालों में गौरैया की संख्या में काफी कमी आई है।

वन संरक्षक कोर्ट केस एपी सिन्हा ने कहा कि 1950 के दशक में चीन में बहुत बड़ी तादात में फसलों को गौरैया से बचाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में गौरैया को मारा गया था। जिसके दुष्परिणाम आगामी सालों में देखे गये।

 

 आशु दास