आज भी मनोरंजन के लिए पहाड़ पर होता है पांडव नृत्य

देहरादून। जहां आज हम प्रगति के साधनों से लगातार बढ़ते जा रहे हैं। लेकिन देवभूमि उत्तराखंड में आज ही मनोरंजन के लिए सदियों पुराने तरीकों को लोग ज्यादा मुफीद मानते हैं। आज भले पीएम मोदी देश को डिजिटल इंडिया से जोड़ना चाहते हों पर यहां के लोग आज भी अपने मंनोरंजन के लिए देसी चीजों पर ही निर्भर रहना चाहते हैं। जिसको लेकर यहां के लोगों का कहना है कि इससे हम अपने धार्मिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सुख के करीब रहते हैं।

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लोगों का मानना है कि इन परम्परागत चीजों से और विधाओं से यहां के बाशिदों में हमेशा अपने संस्कार और अपनी माटी की महक बनी रहती है। इसी वजह से इन दिनों उत्तराखंड में पांडव नृत्य का लगातार सीमांत के सदूर पहाड़ों पर आयोजन किया जा रहा है। कई गांवों में ये आयोजन 30 से अधिक सालों के बाद हो रहा है। कहा जाता है इन दिनों पहाड़ पर केती बाड़ी का काम नहीं होता ऐसे में लोग खाली होते हैं। तो मनोरंजन के लिए इस नृत्य का सहारा लेते हैं।

पांडव नृत्य को लेकर कहा जाता है कि इसका आयोजन 12 से 45 दिन तक किया जाता है। इस की एक आस्था केदारनाथ और घाटी में स्थित हर मंदिरों से भी जुड़ी है। अज्ञातवास से लेकर पांडवों ने यहां पर कई बार यात्राएं की हैं। इसीलिए इस नृत्य में अक्सर परम्परागत वाद्य यंत्रों के साथ पांडवकालीन युद्ध कला का अनुपम नजारा भी देखने को मिलता है।