झारखंड : धर्मातरण मुद्दा उठाने के लिए मुख्यमंत्री की आलोचना

रांची| झारखंड में विपक्ष तथा जनजाति समुदाय के नेताओं ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री रघुबर दास पर आरोप लगाया कि दो भूमि अधिनियमों में प्रस्तावित संशोधन के खिलाफ जारी आंदोलन को कमजोर करने के लिए उन्होंने धर्मातरण का मुद्दा उठाया है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे दास ने दावा किया कि जनजाति समुदाय के लोगों के ‘धर्मातरण में शामिल’ लोग ही छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटीए) तथा संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटीए) में संशोधन के सरकार के प्रयासों के खिलाफ विरोध भड़का रहे हैं।

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दास द्वारा धर्मातरण से संबंधित बार-बार दिया गया बयान ईसाई समुदाय के लोगों व भूमि संशोधन का विरोध कर रहे नेताओं को पसंद नहीं आया है। दास ने गुरुवार को एक बार फिर दुमका में एक आधिकारिक कार्यक्रम में मुद्दे को उठाया, जिसकी कई पार्टियों व संगठनों ने आलोचना की। आदिवासी संघर्ष मोर्चा के संयोजक कर्मा उरांव ने आईएएनएस से कहा, “मुख्यमंत्री राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय को धमका रहे हैं। समाधान ढूंढ़ने के बजाय धर्मातरण का मुद्दा उठाकर वह लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास कर रहे हैं।उरांव ने कहा कि दास जानबूझकर समाज को बांटने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “लेकिन उनका यह उपाय काम नहीं करेगा और विरोध जारी रहेगा।”

आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के अध्यक्ष प्रेम चंद्र मुर्मू ने आईएएनएस से कहा, “यदि रघुबर दास आदिवासी व मूलवासी शब्द का नाम सुन नहीं सकते तो उन्हें अपने राज्य छत्तीसगढ़ चले जाना चाहिए।” उन्होंने कहा कि दास सरकार हर कदम पर नाकाम रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस नेता सुबोध कांत सहाय ने आईएएनएस से कहा, “भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जारी विरोध के दौरान दो बार पुलिस की गोलीबारी के बाद झारखंड की छवि राष्ट्रीय स्तर पर धूमिल की गई।सहाय ने कहा कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास व पुनस्र्थापन अधिनियम, 2013 का उल्लंघन करते हुए दास संथाल परगना में जमीन औनेपौने भाव में अडानी समूह को देने का प्रयास कर रहे हैं।

सहाय ने आश्चर्य जताते हुए कहा, “झारखंड में कहां धर्मातरण हो रहा है?” उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा भूमि संशोधन का कदम उठाने के बाद राज्य के अल्पसंख्यक सहमा हुआ महसूस कर रहे हैं। पूर्व मंत्री ने कहा, “भाजपा सांप्रदायिक दांव चल रही है, जैसा वह अतीत में भी कर चुकी है और मुझे नहीं लगता कि इससे प्रदर्शन कमजोर होगा।

झारखंड सरकार भूमि कानून में बदलाव के लिए जून में दो अध्यादेश लेकर आई थी, जिसे राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेज दिया।संशोधन के बाद अधिग्रहित जमीनों का इस्तेमाल सड़कों का निर्माण तथा विद्युत परियोजनाओं जैसे गैर कृषि उद्देश्यों के लिए हो सकता है।विपक्षी पार्टियों के अलावा, गठबंधन सरकार में शामिल ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) व जनजाति संगठन सरकार के इस कदम का विरोध कर रहे हैं।