दुखिन के शरीर ने छोड़ा साथ फिर भी हौसलों से भरी उड़ान

धमतरी (छत्तीसगढ़)। जहां चाह है वहां राह है! ये कहावत तो आपने कई बार सुनी होगी लेकिन आज इस कहावत को छत्तीसगढ़ के धमतरी में रहने वाली 65 साल की दुखिन बाई ने सही साबित कर दिखाया। आजकल की इस भागती-दौड़ती जिंदगी में लोगों के पास दूसरो के लिए तो छोड़ो बल्कि अपनो के लिए भी समय नहीं है, पर इनसे मिलने के बाद शायद आपके विचार आपका साथ पूरी तरह छोड़ देगें।

धमतरी विकासखंड की ग्राम पंचायत सेमरा-बी में रहने वाली दुखिन बाई यादव ने अपने जीवन को गांव और स्कूल के विकास में पूरी तरह समर्पित कर दिया है, वह भी बिना किसी व्यक्तिगत लालसा से, और इसी वजह से उनके योगदान को देखते हुए 15 अगस्त को उन्हें जिला प्रशासन ने सम्मानित किया।school

भले ही आज दुखिन दीदी के कमजोर शरीर ने उनका साथ छोड़ दिया है लेकिन उनके नेक इरादें आज भी उतने ही बुलंद है। वैसे तो इनका पूरा नाम दुखिन बाई यादव है लेकिन लोग इन्हें प्यार से दुखिन दीदी कहकर बुलाते है। 65 साल की दुखिन दीदी ग्राम सेमरा-बी में मिडिल स्कूल परिसर के सामने छोटे से खदरनुमा होटल में बड़ा-भजिया और चाय बेचती हैं, लेकिन दीदी ने सीमित संसाधनों और अल्प आय के बाद भी स्कूल व अन्य शासकीय संस्थाओं की सुविधाओं में विस्तार करने में अपनी जिंदगी पूरी तरह समर्पित कर दी।

वह गांव ही नहीं, क्षेत्र के लिए आदर्श बन चुकी हैं। उनके सेवाभाव को देखकर ग्रामीणों ने भी आगे आकर पंचायत को सशक्त और मजबूत बनाने में भरपूर सहयोग दिया। कम आय होने के बाद भी जीवन के एकाकीपन को सकारात्मक दिशा देते हुए दुखिन बाई ने एक तरह से गांव भर के बच्चों को अघोषित तौर पर गोद ले रखा है। उनका मानना है कि पैसे के अभाव में वो पढ़ नहीं पाई, लेकिन गांव के हर बच्चे को वो अपना मानती मानती है। उनकी पढ़ाई में कोई कमी या कोरकसर न रह जाए, इसलिए उनकी हर कोशिश उनकी भलाई के लिए होती है।

वैसे अगर आप स्कूल के लिए दुखिन दीदी के योगदानों को गिनने बैठें, तो फेहरिस्त काफी लंबी हो जाएगी। फिर भी स्कूल परिसर में घुसते ही उनके योगदान की मिसालें दिखाई देती है। कुछ समय पहले स्कूल परिसर में पेयजल का अभाव था जिसे देखते हुए वर्ष 2013 में दुखिन बाई ने अपने गुल्लक को तोड़कर उसमें जमा पूरी राशि 22000 को शाला प्रबंधन समिति को दान कर दिया। इतना ही नहीं, वर्ष 2014 में दो हजार रुपये दान कर मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित कराई। जब उन्हें बताया गया कि दूषित पानी से बच्चों को पीलिया, दस्त और उल्टी जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं, तो उन्होंने वर्ष 2015 में 8000 रुपये दान देकर वाटर फिल्टर का इंतजाम कराया।

इसके अलावा दुखिन बाई ने स्कूल में एक बेड की भी व्यवस्था कराई, जिससे की बाीमार बच्चे का तुरंत उपचार किया जा सके। इसके साथ ही स्कूल और पंचायत भवन में वह प्रतिदिन मुफ्त में चाय-नाश्ता भी बांटती हैं। इस बारे में जब उनसे पूछा गया कि इन सबसे आपको क्या मिलता है? पूछने पर दुखिन दीदी हंसते हुए कहती हैं, मैं यह सब अपनी खुशी के लिए करती हूं। मेरे छोटे-छोटे प्रयासों से अगर इन बच्चों और शिक्षकों को बड़ी खुशी हासिल होती है तो मैं समझती हूं कि मेरा जीवन सफल हो गया।

अपने व्यक्तिगत आर्थिक सहयोग से स्कूल प्रबंधन में विशेष योगदान देने वाली दुखिन को स्वतंत्रता दिवस के दिन शिक्षा के क्षेत्र में सामुदायिक सहभागिता के लिए सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री अजय चंद्राकर ने प्रदान किया।

(इनपुट एजेंसी सहित)