…अब देश में बनेगा Biotherapeutic प्रोटीन

चंडीगढ़ के माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने Streptokinase और Erythropoietin की ही तरह biotherapeutic का उत्पादन करने के लिए एक नवीन तकनीक का विकसित कर लिया है। indigenous technology के दवारा हेपेटाइटिस बी, कर्क, एनीमिया, दिल का दौरा कई अन्य रोगों की दवाओं में लगातार बढ़ रहे मूल्यों को कम किया जा सकेगा।

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भारत जेनेरिक दवाओं को लगभग विश्व में निर्यात करता है, लेकिन इंसुलिन के उत्पादन के लिए Biotherapeutic प्रोटीन को भारत को अन्य देशों से आयात करना पड़ता है। जहां एक तरफ एरिथ्रोपीटिन खून की कमी को दूर करने में मदद करती है वहीं दूसरी तरफ Streptokinase धमनियों या फेफड़ों के रक्त के थक्के की बीमारी का इलाज है।

माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी (सीएसआईआर) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ जगमोहन सिंह ने बताया कि इन तकनीकों से बैक्टीरिया और खमीर की तरह अलग-अलग माइक्रोबियल जीन्स के बारें में जानकारी मिलती है। उत्पादन की सरलता के कारण ही दुनिया भर में पुनः संयोजक की ये तकनीक दुनिया भर प्रचलित है।

सिंह ने कहा कि उनकी प्रयोगशाला ने आम जनता को ये दवाए सस्ती कीमतों पर उपलब्ध कराने के लिए स्वदेशी तकनीकों का विकास कर लिया है। Schizosaccharomyces pombe एक नई प्रणाली है जो विखंडन खमीर के नाम से जानी जाती है जिसमें हैपिटाइटिस बी, एचबीएस की तरह अन्य टीके बनाने की क्षमता है। इस तकनीक का प्रयोग करके erythropoietin की तरह अन्य एंटीबॉडी का उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है। भारत में हेपेटाइटिस बी के 10 माइक्रोग्राम की कीमत 45 से 120 है और संयुक्त राज्य अमेरिका में ये प्रति खुराक 25डालर है।

जबकि एक वयस्क व्यकित की खुराक 10 माइक्रोग्राम की दोगुनी है। स्वदेशी प्रौद्योगिकी की इस तकनीक से वाणिज्यिक उत्पादन के दवारा 10 रूपे से भी कम हो जाएगा। भारत में हेपेटाइटिस बी से संक्रमित रोगियों की तादाद 40 लाख है और चीन दूसरे नंबर पर है। जयादातर हेपेटाइटिस बी रोगियों को लीवर कैंसर है जिन्हें खुद भी अपनी बीमारी के बारे में नहीं पता।

डॉ सिंह ने बताया कि अब तक हैपेटाइटिस बी के टीके को बड़े पैमाने पर विकसित किया जा चुकी है। एक बार प्रोडक्शन के स्तर का विकास होते ही हैपेटाइटिस बी प्रति व्यकित खुराक 1 रूपए हो सकती है। जबकि पहले की पीचिया आधारित प्रणाली की सबसे कम कीमत 45 रूपए है और ये गरीबी रेखा के नीचे के लोगों की पहुंच से परे है।

“डॉ सिंह ने कहा अवधारणा चरण पूरा होते ही वो आने वाले सालों में इंसुलिन, एंटीबॉडी, विखंडन खमीर के लिए भारतीय और बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के लिए प्रौद्योगिकी के लाइसेंस लेने की तैयारी कर रहे है। हेपेटाइटिस बी (एचबीएस) के टीके की कीमत विश्व बाजार में 3.2 अरब डालर से ज्यादा है। कैंसर से लड़ने के लिए मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का बाजार भी बढ़ रहा है। Pichia की वर्तमान लोकप्रिय प्रणाली पेटेंट है इसलिए इसलिए उत्पादों का बाहर से आयात किया जा रहा है।

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(एन.बी नायर, वरिष्ठ पत्रकार)