पिंडदानियों के लिए तैयार है ‘गया’

गया। पितृपक्ष में पितरों को मोक्ष दिलाने की कामना के साथ बिहार के गया आने वाले पिंडदानियों के लिए ‘विष्णुनगरी’ गया सज-धज कर तैयार हो गया है। इस साल पितृपक्ष मेला 15 सितंबर से शुरू हो रहा है। पुरखों (पूर्वजों) को पिंडदान करने के लिए आने वाले देश-दुनिया के पिंडदानियों का यहां इंतजार हो रहा है। वैसे कई पिंडदानी यहां पहुंच भी गए हैं। प्रशासन और गयापाल पंडा समाज के द्वारा तीर्थ नगरी गया में आने वाले लोगों के रहने की व्यवस्था की गई है, जबकि धर्मशाला, होटल, निजी आवास पिंडदानियों से भरने लगे हैं।

भगवान विष्णु की नगरी ‘मोक्ष धाम’ गया पिंडदान के लिए देश-विदेश से आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए पूरी तरह तैयार है। गया जिला के एक अधिकारी के मुताबिक, इस वर्ष पितृपक्ष के मौके पर यहां पांच लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितरों की आत्मा की शांति एवं मुक्ति के लिए पिंडदान अहम कर्मकांड है। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष को ‘पितृपक्ष’ या ‘महालय पक्ष’ कहा जाता है, जिसमें लोग अपने पुरखों का पिंडदान करते हैं। मान्यता है कि पिंडदान करने से मृत आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। वैसे तो पिंडदान के लिए कई धार्मिक स्थान हैं, लेकिन सबसे उपयुक्त स्थल बिहार के गया को माना जाता है।

1

इस वर्ष फल्गु नदी में अधिक पानी होने के कारण जिला प्रशासन द्वारा अत्यधिक संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को लेकर कई स्थानों पर खुले मैदान में तंबू लगाए गए हैं, ताकि श्रद्धालु यहां रात गुजार सकें। पूर्व में लोग फल्गु तट पर भी रात गुजार लेते थे। गया के जिलाधिकारी कुमार रवि ने बताया कि अपने पितरों को मोक्ष दिलाने के उद्देश्य से यहां पितृपक्ष में लाखों लोग आते हैं। प्रशासन आने वाले लोगों को हर सुविधा मुहैया कराने के लिए तत्पर है।

उन्होंने बताया कि मेला में किसी भी प्रकार की परेशानी के लिए प्रशासन द्वारा एक कॉल सेंटर बनाया गया है, जिसमें हेल्पलाइन के नंबर पर परेशानी बताई जा सकती है। कॉल सेंटर में तैनात अधिकारी मिली शिकायत को संबंधित क्षेत्र के पुलिस अधिकारियों और अधिकारियों को देंगे। इस वर्ष पितृपक्ष के मौके पर पंडा आवासों को भी श्रद्धालुओं को रहने देने की अनुमति दी गई है। जिला प्रशासन तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बस सेवा और स्वास्थ्य सेवा के बेहतर इंतजाम का दावा कर रहा है।

एक अधिकारी के मुताबिक, इस वर्ष 15 सितंबर से शुरू होने वाले विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले में होटल, गयावाल पंडा के निजी आवास और धर्मशालाओं में पिंडदानी ठहरेंगे। संवास सदन समिति के पास 438 धर्मशाला और निजी मकानों में पिंडदानियों के ठहरने के लिए आवेदन दिए गए हैं। इनमें एक बार कम से कम 45 हजार और गया के कुल 77 होटलों में 14 हजार पिंडदानियों के ठहरने की व्यवस्था है।

उल्लेखनीय है कि इस मेले को ‘राजकीय’ मेले का दर्जा मिला हुआ है। गयावाल पंडा समाज के गणेश पंडा कहते हैं, पिंडवेदी कोई एक जगह नहीं है। तीर्थयात्रियों को धार्मिक कर्मकांड में दिनभर का समय लग जाता है। लोग पूरी तरह थक जाते हैं। ऐसे में तीर्थयात्री अपने परिवार के साथ आराम की तलाश करते हैं। उन्होंने कहा कि आश्विन माह के कृष्णपक्ष के पितृपक्ष पखवारे में विष्णुनगरी में अपने पितरों को मोक्ष दिलाने की कामना लिए देश ही नहीं, विदेशों से भी सनातन धर्मावलंबी गया आते हैं। देश में सबसे ज्यादा बंगाल, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा के अलावा दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल, ओडिशा, चेन्नई के पिंडदानी यहां आते हैं।

देश के अलावा नेपाल, श्रीलंका, बर्मा, तिब्बत, भूटान आदि देशों के हिंदू धर्मावलंबी कर्मकांड को गया आते हैं। कई बार अमेरिकी और यूरोपीय देशों में बसे हिंदू धर्मावलंबी भी श्राद्ध के लिए गया आते हैं।
गया की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गरिमा मलिक ने आईएएनएस को बताया कि पूरे मेला क्षेत्र में 66 अस्थायी पुलिस केंद्र बनाए गए हैं, जहां सुरक्षाकर्मी, दंडाधिकारी के साथ तैनात रहेंगे। चोर-उचक्कों पर नजर रखने के साथ ही बुजुर्ग तीर्थयात्रियों की सेवा भावना से सहयोग करने के लिए भी पुलिसकर्मियों को निर्देश दिया गया है। उन्होंने बताया कि मेला की सुरक्षा में तैनाती के लिए दूसरे जिलों से भी पुलिस बल बुलाया गया है। इसके साथ ही बम निरोधक दस्ता, खोजी कुत्तों की टीम और सीसीटीवी कैमरा का सहयोग लिया जाएगा।

फल्गु नदी में देवघाट, सीताकुंड समेत सभी स्थलों पर वाच टावर बनाया जा रहा है, जहां से सुरक्षाकर्मी पूरे मेला क्षेत्र पर निगरानी रख सकेंगे। पुलिसकर्मी रेलवे स्टेशन क्षेत्र से लेकर पिंडवेदियों तक पैनी निगाह रखेंगे। उल्लेखनीय है कि गया में पितृपक्ष मेला 17 दिनों तक चलता है। यह मेला गया शहर, बोधगया सहित अन्य स्थानों में फैला होता है। इस मेले में कर्मकांड का विधि-विधान कुछ अलग-अलग है। श्रद्धालु एक दिन, तीन दिन, सात दिन, 15 दिन और 17 दिन तक का कर्मकांड करते हैं। कर्मकांड करने आने वाले श्रद्धालु यहां रहने के लिए तीन-चार महीने पूर्व से ही इसकी व्यवस्था कर चुके होते हैं।