जानिए आखिर क्यों मनाते हैं जन्माष्टमी!

नई दिल्ली। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का दिन यानि कि जम्माष्टमी को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे इसलिए इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन मौके पर भगवान कृष्ण की मोहक छवि देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आज के दिन मथुरा पहुंचते हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जाती है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। ज्न्माष्टमी में लोग 12 बजे तक व्रत रखते हैं और भगवान के अभिषेक के बाद अपना व्रत खोलते है। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है, साथ ही रासलीला का आयोजन भी होता है।

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भगवान श्रीकृष्ण विष्णुजी के आठवें अवतार माने जाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार उनका जन्म अपने कंस के कारागार में हुआ था। कंस ने अपनी मृत्यु के भय से बहिन देवकी और वसुदेव को कारागार में कैद किया हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि कृष्ण जन्म के बहुत तेज बारिश हो रही थी। चारों तरफ घना अंधेरा छाया हुआ था। श्रीकृष्ण का जन्म होते ही वसुदेव-देवकी की बेड़ियाँ खुल गईं, कारागार के द्वार स्वयं ही खुल गए, पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वसुदेव किसी तरह श्रीकृष्ण को उफनती यमुना के पार गोकुल में अपने मित्र नन्द के घर ले गए।

वहाँ पर नन्द की पत्नी यशोदा को भी एक कन्या हुई थी। वसुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को अपने साथ ले गए। कंस ने उस कन्या को पटककर मार डालना चाहा। किन्तु वह इस कार्य में असफल रहा। श्रीकृष्ण का लालन–पालन यशोदा व नन्द ने किया। बाल्यकाल में ही श्रीकृष्ण ने अपने मामा के द्वारा भेजे गए अनेक राक्षसों को मार डाला और उसके सभी कुप्रयासों को विफल कर दिया । अन्त में श्रीकृष्ण ने कंस को भी मार दिया।

श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का नाम ही जन्माष्टमी है। गोकुल में यह त्योहार ‘गोकुलाष्टमी’ के नाम से मनाया जाता है।