दीवाली के अगले दिन क्यों की जाती है गोवर्धन पूजा?…जानिए यहां

नई दिल्ली। दीपावली के अगले दिन कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष को गोवर्धन पूजा की जाती है। कई जगह इस पूजा को अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। गोवर्धन पूजा के दिन गायों की पूजा होती है। शास्त्रों के अनुसार गाय को लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है इसलिए गाय को गंगा जैसे पवित्र और माता की उपाधि दी जाती है। शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन मनाया जाने वाला ये त्योहार हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार माना गया है।

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गोकुल में जब भीषण बारिश से लोग परेशान हो रहे थे तो भगवान कृष्ण ने गोकुलवासियों गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका उंगली से उठा लिया और सात दिन तक पूरा गोकुलधाम उसी पर्वत की छाया में रहा। सातवें दिन कृष्ण ने गोर्वधन पर्वत की पूजा की और तभी अन्नकूट उत्सव मनाने को कहा। तब से ये पर्व अन्नकूट के नाम से भी जाना जाने लगा।

जानिएं गोवर्धन कथा :-

देवराज इन्द्र के अभिमान चूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने एक लीला रची। सभी बृजवासी उत्तम पकवान बनाते हुए देख कृष्ण ने मईया यशओदा से पूछा कि ये किसकी पूजा की तैयारी चल रही है। इस पर मईया ने बताया की गोकुल में भगवान इन्द्र के लिए अन्नकूट की तैयारी हो रही है। मैया के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण बोले मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? यशोद मां ने कहा कि इन्द्र देव ही वर्षा करते हैं जिससे अन्न पैदा होता, सभी गायों को चारा मिल पाता है इस पर कृष्ण बोले हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं,
इन्द्र को तो कभी किसी ने देखा भी नहीं और पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं इसलिए हमें ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए।

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जिसके बाद इन्द्र के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा की गई। ऐसा करने पर देवराज इन्द्र को लगा ये उनका घोर अपमान है और उन्होने तेज बारिश करना शुरू कर दिया। इस भीषण बारिश से परेशान बृजवासी भगवान कृष्ण को इस आपदा का कारण बताया। तब मुरलीधर अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी गोकुलवासियों को पर्वत के नीचे ही शरण मिली। जिसके बाद इन्द्र को लगा कि ये कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो सकता। उन्होंने ब्रह्मा जी को सारी बात बताई इस पर इन्द्र को कृष्ण की इस लीला से अवगत कराया कि वह भगवान विष्णु के साक्षात अंश हैं। इसके बाद इन्द्र ने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी। इस घटना के बाद से ही गोवर्धन पूजा की जाने लगी।

पूजन विधि :-

-सायंकाल के समय घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन का पहाड़ बनाएं।

-इसके बाद मौली, रोली, चावल, फूल, दही और तेल का दीप जलाकर रखें।

-फिर गिरिराज देवता की अन्नकूट चढ़ाकर पूजा-अर्चना की जाती है।

-गाय को गुण खिलाकर आरती करने को भी शुभ माना गया है।

-शास्त्रों में इस दिन घर में छप्पन प्रकार के भोजन बनाकर भगवान को अर्पित करने को भी शुभ माना गया है।