छठ पूजाः सूर्यदेव की उपासना का महापर्व एक कठिन तपस्या,जानें कैसे करते हैं व्रत

छठ पूजाः सूर्यदेव की उपासना का महापर्व एक कठिन तपस्या,जानें कैसे करते हैं व्रत

छठ पूजाः पर्व और त्योहार भारतीय सनातन संस्कृति के अनुपम और अद्धितीय स्तम्भ है।जिनके मजबूत आधार पर हमारी सभ्यता और संस्कृति का विकास होता है।त्यौहारों और पर्वों से जहां मानव जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।वहीं इन पर्वों से भागाभागी और तेज रफ्तार जीवन में एक मानसिक सुकून भी मिलता है।त्यौहार ही है जो हमें हमारी सभ्यता ,संस्कृति और परम्परा से जोड़ते हैं। पर्वों और त्यौहारों की इसी बेजोड़ श्रृखला में भगवान सूर्यदेव की उपासना का एक पर्व भी आता है।जिसे लोकआस्था का पर्व छठ महापर्व भी कहते हैं।

 

छठ पूजाः सूर्यदेव की उपासना का महापर्व एक कठिन तपस्या,जानें कैसे करते हैं व्रत
छठ पूजाः सूर्यदेव की उपासना का महापर्व एक कठिन तपस्या,जानें कैसे करते हैं व्रत

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कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकति जाय।बात जे पुछेलें बटोहिया,बहंगी केकरा के जाय ? दीपावली के बाद से ये गीत और इसके बोल मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई के इलाकों में गूंजने लगते है। क्योंकि त्यौहारों के मौसम में दीपावली की धूम के बाद कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व छठ महा पर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। प्रायः हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलंवी भी मनाते देखे गए हैं।

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छठ पर्व छठ, षष्टी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास में इस चार दिवसिए व्रत हमारे देश में सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध है। मूलत: सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है।

 

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मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता

पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। छठ लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृ का षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी। छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथा संभव रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में है।

छठ व्रत  एक कठिन तपस्या की तरह है

छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन भी कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है।

व्रती किसी प्रकार की सिलाई वाले कपड़े नहीं  पहनते

छठ उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं होती है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ पूजा करते हैं।बता दें कि इस पर्व को शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालों साल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।

छठ का पर्व चार दिनों का है। छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। ये पर्व जहां आध्यात्मिक चेतना का संचार करता है वही ये हमें हमारी परम्परा और संस्क़ति से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है।

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महेश कुमार यादव