‘ऊं’ के उच्चारण से दूर होती है नकारात्मक उर्जा…

हिन्दू धर्म में ओम के उच्चारण को बहुत महत्व दिया गया है। ओम का उच्चारण सारी नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है। आज हम आपको ओम् के महात्य् को बताने का प्रयास करेंगे। सर्वप्रथम यह जानना है कि इसे कैसे उच्चारित किस प्रकार करें? ओम का यह चिन्ह ऊं अद्भुत है, अलौकिक है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक स्वमरूप है। बहुत-सी आकाश गंगाएं इसी तरह फैली हुई हैं जैसे ओम फैला है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है। कई विद्वानों नें कहा कि यह ब्रह्माण्ड। फैल रहा है। आइंसटाइन भी यही कह कर गए हैं कि ब्राह्मांड फैल रहा है।

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आइंसटाइन से पूर्व भगवान महावीर ने कहा था। महावीर से पूर्व वेदों में इसका उल्लेख मिलता है। महावीर ने वेदों को पढ़कर नहीं कहा, उन्होंने तो ध्यान की अतल गहराइयों में उतर कर देखा तब ओम् के रहस्यह को बताया। गीता में भी शब्द ब्रह्म की चर्चा है… गीता में भी एक जगह मिलता है कि जिज्ञासुरपि योगस्यो शब्द ब्रह्माति वर्तते। ऊं को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त ओ पर ज्यादा जोर लगाना होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। यही है मंत्र बाकी सभी है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत चल रहा है। अनहत ध्वतनि में कभी घंटे तो कभी शंख या बांसुरी की सुरीली सुमधुर ध्वीनि मन को मोह लेती है। और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम। साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णतः मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ऊं का उच्चारण करते रहना।

ऊं शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, ऊ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भूः लोक, भूवः लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है। तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं। सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दांत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है। इसके उच्चािरण के लिए सर्वप्रथम प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ऊं का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ऊं जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ऊं जप माला से भी कर सकते हैं। ओम के जप करने से शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियां दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं।

इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। साधकगण ध्यान दें कि प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में टॉक्सिक पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह आल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है। ओम शब्दभ जपने से शरीर के चारों ओर एक ऐसा आभा मण्ड ल तैयार हो जाता है जो साधक की रखा करता है। ओम के जपने से एक ऐसा तंतु उत्पन्न होता है जो मन को पवित्र करता है।