यमुना की प्रदूषण मुक्ति पर राजनीति ?

लंबे समय से दिल्ली न केवल वायु प्रदूषण से बल्कि राजनीतिक प्रदूषण से भी दूषित है। आम जनजीवन की जिंदगी की परवाह किसी को नहीं है। वायु प्रदूषण, यमुना का लगातार दूषित होना, जानलेवा बीमारियों का हावी होना, दीपावली पर आतिशबाजी का धुआं होना, पड़ोसी राज्य हरियाणा और पंजाब द्वारा पराली जलाने, सड़कों की दुर्दशा- ऐसी समस्याएं हैं जो दिल्ली के जनजीवन को धुंधला रही है, पीड़ित कर रही है। ऐसा लगता है दिल्ली का कोई माई-बाप नहीं है, दिल्ली की कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। सरकार है-पर प्रशासन नहीं, साधन है-पर अवसर नहीं। हर वर्ष सुप्रीम कोर्ट इन मुद्दों पर सरकारों को फटकार लगाती है लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात। कभी सम-विषम वाहन फार्मूला लागू किया गया, कभी दिल्ली में प्रवेश करने वाले पुराने व्यावसायिक वाहनों पर प्रतिबंध की सिफारिश की गई, समस्या यह है कि राज्य सरकारें और उनकी एजेंसियां और लोग हर बात से परिचित हैं लेकिन कोई भी आवश्यक उपायों के लिए प्रतिबद्धता नहीं जता रहा। प्रदूषण कम करने के लिए सरकार विज्ञापनों पर काफी धन खर्च करती है लेकिन इसका उद्देश्य प्रदूषण मुक्ति से ज्यादा कहीं राजनीतिक रोटियां सेंकना है। आखिर कब तक दिल्ली की जनता इन चुनौतियों से जुझती रहेगी।

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दिल्ली नैतिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक और आम जन-जीवन से जुड़े क्षेत्रों में मनोबल के दिवालियेपन के कगार पर खड़ी है और हमारा राजनीतिक नेतृत्व और चुनी हुई सरकार विकास और हर चुनौती से मुकाबला करने के लिए तैयार है का नारा देकर अपनी नेकनीयती का बखान करते रहते हैं। पर अच्छा इरादा अच्छे कार्य का विकल्प नहीं होता। नदी में गिरी बर्फ की शिला को गलना है ठीक उसी प्रकार दिल्ली के बाधक तत्वांे को भी एक-न-एक दिन हटना है। यह स्वीकृत सत्य है कि जब कल नहीं रहा तो आज भी नहीं रहेगा। उजाला नहीं रहा तो अंधेरा भी नहीं रहेगा। चुनौतियां हमारी नियति है तो उसे स्वीकारना और मुकाबला करना हमें सीखना ही होगा अन्यथा लगातार कमजोर और घायल होती दिल्ली को खतरे सदैव घेरे रहेंगे। शरीर पर अगर घाव है तब मक्खियां तो आयेंगी ही।

किसी भी समस्या का मुकाबला करने का मनोबल हृदय से उपजता है। आज आवश्यकता केवल राजनीतिक हितों को साधने की नहीं बल्कि जनजीवन को स्वस्थ और आदर्श जीवनशैली देने की भी है। आवश्यकता केवल चुनौतियों को समझने की ही नहीं है बल्कि दृढ़ मनोबल के साथ उन चुनौतियों का सामना करने के लिए ईमानदार प्रयत्नों की भी है। अपने स्वार्थ को नहीं, बल्कि दिल्ली के हितों को अधिमान देना जरूरी है। खुशी की बात है दिल्ली सरकार यमुना नदी के किनारे रिवर बेल्ट विकसित करने को तैयार हुई है। दिल्ली की सरकार न पहली बार कोई अराजनीति काम करने का मन बनाया है, इससे यमुना को प्रदूषण मुक्त करने को लेकर उनकी गंभीरता का पता चलता है। सरकार का कहना है कि योजना में फंड की कमी नहीं आने दी जाएगी और डेढ़ वर्ष में काम पूरा कर लिया जाएगा। इससे दिल्लीवासियों में उम्मीद जगी है कि जल्द ही यमुना स्वच्छ हो जाएगी। उसका स्वच्छ होना जरूरी भी है। क्योंकि यमुना नदी ही नहीं, बल्कि दिल्ली की जीवनधारा है। हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार यमुना नदी, यमराज की बहन है। जिसका नाम यमी भी है। यमराज और यमी के पिता सूर्य हैं। यमुना नदी का जल पहले साफ, कुछ नीला, कुछ सांवला था, इसलिए इन्हें ‘काली गंगा’ और ‘असित’ भी कहते हैं। असित एक ऋषि थे।

सबसे पहले यमुना नदी को इन्होंने ही खोजा था। तभी से यमुना का एक नाम ‘असित’ संबोधित किया जाने लगा। सदियों से कल-कल बहती यमुना दिल्लीवासियों की जल की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। जिस तरह भगवान श्रीकृष्ण को ब्रज संस्कृति का जनक कहा जाता है, ठीक उसी तरह यमुना को जननी का स्थान दिया गया है। ब्रह्म पुराण में उल्लेखित है कि ‘जो सृष्टि का आधार है और जिसे लक्षणों से सच्चिदानंद स्वरूप कहा जाता है, उपनिषदों ने जिसका ब्रह्म रूप से गायन किया है, वही परमतत्व साक्षात् यमुना है।’ यमुना हमारी संस्कृति है, आस्था का केन्द्र है, उसे प्रदूषित करने का अर्थ है, अपनी जीवन सांसों को कम करना।

यह सच्चाई है कि यमुना को लेकर चिंता तो बहुत जताई जाती है, लेकिन इसके प्रवाह को अविरल बनाने के लिए अब तक कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई, जिससे समस्या हल नहीं हुई है। इस दिशा में दिल्ली सरकार की पहल से उम्मीद जगी है, यह प्रसन्नता की बात है। सरकार इसमें आम जनता को भी जोड़ना चाहती है और इसके लिए यमुना आरती शुरू की गई है। इसके साथ ही पाठ्यक्रम में यमुना के इतिहास को शामिल करने का फैसला किया गया है। इससे बच्चे यमुना के बारे में जान सकेंगे और उनका इस नदी के साथ लगाव भी बढ़ेगा। इस तरह के कुछ और कदम उठाने की जरूरत है क्योंकि जबतक दिल्लीवासी इस नदी के साथ जुड़ाव महसूस नहीं करेंगे तब तक यह स्वच्छ नहीं हो सकती है। आस्था के नाम पर लोग यमुना में पूजन सामग्री प्रवाहित कर और मूर्तियों का विसर्जन कर इसे दूषित कर रहे हैं। इसलिए लोगों को जागरूक करने की जरूरत है ताकि वह जान सकें कि उनकी वजह से नदी को कितना नुकसान पहुंच रहा है।

यमुना के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण वर्तमान में अनेकों नालों से गंदा पानी, औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ, ठोस कचरा आदि यमुना में सीधे छोड़ा जाना भी है। इसके अलावा फैक्टियों से जाने वाला प्रदूषित पानी यमुना को जहरीला बनाने का काम कर रहा है। इन स्थितियों के बीच यमुना को न केवल दर्शनीय बनाना बल्कि उसको प्रदूषण मुक्त करना एक बड़ी चुनौती है और अगर इस चुनौती को सफलतापूर्वक पार करने में दिल्ली सरकार सफल होती है तो यह उसके खाते में सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। जिस तरह अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट को संवारा गया है ठीक उसी तरह दिल्ली की यमुना नदी को सजाया और संवारा जाए तो यह दिल्ली का एक प्रमुख आकर्षण का केन्द्र बन जाएगा। जैसा कि सोनिया विहार घाट पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का नौकायन अभ्यास केंद्र और इसी तरह की योजनाएं जुड़ने से यमुना को प्रदूषण मुक्त किया जा सकेगा। इसके लिए सरकार बड़े औद्योगिक घराने को भी प्रायोजक के रूप में जोड़ सकती है। इस संपूर्ण योजना को राजधानी दिल्ली की गरिमा के अनुरूप आकार देकर केजरीवाल सरकार अपनी नाकामयाबी पर कामयाबी की मोहर लगा सकती है। केन्द्र सरकार भी इस महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक योजना में सहभागी बनें- यह गैर-राजनीतिक उपक्रम है जिसमें सभी की सहभागिता अपेक्षित है। इसके लिए ईमानदार प्रयत्नों की जरूरत है और ईमानदारी अभिनय करके नहीं बतायी जा सकती, उसे जीना पड़ता है कथनी और करनी की समानता के स्तर तक।

यमुना का प्रदूषण मुक्त होना दिल्ली के जनजीवन के दमघोंटू वातावरण से मुक्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। सरकार को इसी तरह लगातार बढ़ रहे प्रदूषण पर नियंत्रण की दृष्टि से प्रयत्न करने होंगे। क्योंकि दिल्ली में बढ़ता प्रदूषण न केवल खतरनाक है बल्कि जानलेवा होता जा रहा है। आंखों में जलन, फेफड़ों और अन्य तरह के रोग शरीर को जकड़ रहे हैं। पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक हैरान है कि मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की। लोग भी अवगत है कि वायु प्रदूषण उनके खुद के जीवन के लिए नुकसानदेह है लेकिन दिल्ली और पड़ोसी शहरों में जिस मात्रा में पटाखे और आतिशबाजी हुई उससे साफ है कि लोगों को किसी बात की परवाह नहीं, उन्हें अपनी अथवा दूसरी की जिंदगी की कोई परवाह नहीं बल्कि वह तो क्षणिक सुख और आनंद पाना चाहते हैं। यह सही है कि भारतीय संस्कृति और उसकी उत्सवप्रियता आनंद का एक जरिया है लेकिन ऐसे आनंद का क्या औचित्य जो जीवन को ही लील जाए।

Lalit Garg

 

(ललित गर्ग,  981105113)