पाकिस्तान: सावधानी हटी दुर्घटना घटी !

28-29 सितंबर की रात एक सर्जिकल ऑपरेशन में, जब से भारतीय फौजें अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान की नाक काटने की शल्य चिकित्सा कर के आयीं हैं तब से पाकिस्तान के सियासी गलियारे में अप्रत्याशित रूप से हड़कंप मचा हुआ है। प्रतिदिन की आदत के अनुसार 29 सितंबर 2016 को भी तीन पाकिस्तानी अंग्रेजी समाचारपत्रों डॉन, डेली टाइम्स और नेशन की साइट मेरे कंप्यूटर पर खुली हुईं थी। लगभग ग्यारह बजे से वहां एक खबर प्रमुखता से आरही थी कि सीमा पर भारत की गोलीबारी में पाकिस्तान के दो जवान शहीद होगए हैं।

Modi Nawaz

भारतीय सेना के सेना ऑपरेशन के महा निदेशक (डीजीएमओ) रणवीर सिंह की उस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद भी, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान में भारतीय सेना के सर्जिकल ऑपरेशन का खुलासा किया पाकिस्तानी समाचारपत्र पुरानी हेडलाइन ही बनाए रहे। डॉन ने कुछ देर केलिए यह लीड लगाई कि भारतीय सैनिक बाबू लाल चौहान को असलहे के साथ पाकिस्तानी फौज ने अपने कब्जे में लिया है और उसे पूछ-ताछ केलिए पाकिस्तानी सेना किसी अज्ञात स्थान पर लेगई है। ऐसा नहीं कि इन समाचारपत्रों को भारतीय समाचार चैनलों से फीड नहीं प्राप्त हो रहा था। उनके सामने समस्या यह थी कि पाकिस्तानी सेना की अनुमति के बिना वे भारतीय चैनलों से प्राप्त खबरों को अपने समाचारपत्रों में स्थान नहीं दे सकते थे।

इन समाचारपत्रों में यह स्थिति कमो-बेश आनेवाले दिनों में भी बनी रही। आज तक किसी पाकिस्तानी समाचारपत्र में भारत द्वारा सर्जिकल ऑपरेशन का विवरण प्रकाशित नहीं हुआ है, हां भारत के इस ऑपरेशन का मज़ाक उड़ाते हुए और उस पर कुछ तुच्छ और अपनी एक्स्पायरी पर पहुंचे भारतीय छुटभैय्या नेताओं के ‘फेक-ऑपरेशन’ के बयान को इन सभी प्रमुख समाचारपत्रों ने लीड के तौर पर इस्तेमाल किया।

भारतीय दावा और व्यापक अंतर्राष्ट्रीय समर्थन :-

भारत ने बड़ी दूरगामी सोच और योजना से इस शल्य चिकित्सा को अंजाम दिया था। भले ही दावा यह किया गया कि इस पूरे ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तानी सेना नहीं बल्कि आतंकियों को निशाना बनाया गया किन्तु इस पूरी प्रक्रिया में भारत ने मान्य अंतर्राष्ट्रीय सीमा को पार तो किया ही। मुझे ध्यान है जब इसी वर्ष जून में भारतीय सेनाओं ने म्यांमार में ‘हॉट परस्यूट’ में नागा विद्रोहियों के ठिकानों को नष्ट किया था तो इन्हीं पाकिस्तानी समाचारपत्रों में भारत को चेतावनी देने की मुद्रा में संपादकीय प्रकाशित किए गए थे कि भारत को पाकिस्तान को म्यांमार समझने की भूल नहीं करना चाहिए, पाकिस्तान एक परमाणु शस्त्र से सज्जित मजबूत देश है।

मतलब यह कि उसे मुंह तोड़ उत्तर दिया जाएगा। मुझे ध्यान है भारत द्वारा म्यांमार में ‘हॉट परस्यूट’ के बाद बीबीसी हिन्दी सेवा ने 19 जून 2016 को इस प्रकरण पर एक दिलचस्प नज़रिया प्रस्तुत किया था, उसकी सार्थकता आज भी विद्यमान है। मैं उसे यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ “म्यांमार में किया गया भारत का बदले का अभियान ख़ासा घातक है और सोच समझकर किया गया ऑपरेशन है। यह ‘चरमपंथियों’ और भारत के लोगों, दोनों को दिल्ली के नए इरादे का एक संदेश है कि ‘दुश्मन को बख़्शा नहीं जाएगा।’ अगर चरमपंथी यह संदेश समझ जाते हैं और भविष्य में किसी और हमले से परहेज करते हैं तो यह अध्याय यहीं ख़त्म हो जाता है। अगर ऐसा नहीं होता और वो लड़ने का फ़ैसला करते हैं, तो नई दिल्ली को और कड़े फ़ैसले करने पड़ सकते हैं।

इस हमले का व्यापक असर क्या हो सकता है?

पहला, भारत की सीमा और देश के अंदर सक्रिय चरमपंथी समूहों को स्पष्ट हो जाएगा कि नई दिल्ली उनके ख़िलाफ़ अधिक जवान तैनात करेगी। सरकार के बल प्रयोग का आम तौर पर जनता में समर्थन का मूड देखते हुए यह संभव है कि चरमपंथी समूह लंबे समय तक शांत बने रहें। दूसरा, यहां ध्यान देना चाहिए कि नई दिल्ली की कार्रवाई, सज़ा देने वाली और बदले की कार्रवाई थी, न कि किसी विवाद में बिना उकसावे के हस्तक्षेप करने की। यह स्थिति बातचीत से समस्या सुलझाने का मौका खोलती है।

अहम बात यह है कि भारत सरकार से, भारत के उपमहाद्वीपीय और समुद्री पड़ोसी देशों में विवादों में दखलंदाज़ी वाले नज़रिये की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। मालदीव जैसे देशों के साथ हल्की सी ‘राजनयिक झिड़की’ ही बहुत है। इसलिए इस अभियान का यह मतलब नहीं निकालना चाहिए कि भारत पड़ोसी देशों के घरेलू या उन अंतरराष्ट्रीय विवादों में हस्तक्षेप करने का इच्छुक हो गया है, जिनसे भारतीय रक्षा का कोई सीधा संबंध नहीं है।

पाकिस्तान को संकेत :-

इस प्रकरण की मुख्य बात यह है कि इस अभियान में एक किस्म का आत्मविश्वास रहा है। इससे लगता है कि नई दिल्ली ऐसा ही कुछ पाकिस्तान के साथ भी कर सकती है। हालांकि, अधिकांश समीक्षकों, खासकर पाकिस्तान के समीक्षकों ने परमाणु हथियारों के नज़रिये से इसे ख़ारिज़ किया है। यह भी तथ्य है कि म्यांमार की तरह पाकिस्तान सरकार अपनी ज़मीन पर भारतीय फ़ौज के ऐसे किसी अभियान का समर्थन नहीं करेगी।

हालांकि इस अभियान से पाकिस्तानी फ़ौजी-जिहादी समूह यह सोच कर राहत नहीं ले सकते कि वो भारत के ख़िलाफ़ हमले कर सकते हैं लेकिन परमाणु हथियार के कारण भारत के हाथ बंधे रहेंगे। पाकिस्तान को यह संदेश पहुंचाने की ज़रूरत है कि अगर भारत संयम बरत रहा है तो उसने यह विकल्प चुन रखा है. वो बलपूर्वक जवाब देने का भी विकल्प चुन सकता है। हालांकि स्वाभाविक रूप से यह बहुत ख़तरे वाला है किन्तु भारत सरकार संकेत दे रही है कि वो ऐसा ख़तरा लेने को तैयार है।

“वर्तमान संदर्भ में पुनः लौटते हुए, भारत ने भोर होने तक शल्य चिकित्सा के काम को निपटाने के बाद कूटनीतिक कवायद प्रारम्भ कर दी। प्राप्त जानकारियों के अनुसार ऐसा कहा जा रहा है कि भारत ने तत्काल ही संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थायी सुरक्षा समिति के वीटो अधिकार प्राप्त पांचों राष्ट्रों तथा मित्र देशों के राजनयिकों के सम्मुख मय आवश्यक दस्तावेज़ इस ऑपरेशन का प्रस्तुतीकरण कर दिया। परिणाम यह रहा कि अमरीका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, यूरोपीय संघ यहाँ तक कि बंगला देश, श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे देशों ने भारत के द्वारा की गई इस कार्रवाई का जोरदार शब्दों में समर्थन किया। अंतर्राष्ट्रीय जगत में अलग-थलग पड़े पाकिस्तान को चीन से उम्मीद थी कि वह भारत की इस कार्रवाई का विरोध करेगा किन्तु चीन ने पल्ला झाड़ते हुए बयान जारी किया कि भारत और पाकिस्तान को अपने मसलों को आपस में सुलझाना चाहिए। चीन के मुंह से ऐसा सुन कर पाकिस्तान को काठ मार गया।

पाकिस्तानी झूठ का ताना-बाना :-

अंतर्राष्ट्रीय जगत में बहिष्कृत होने के बाद पाकिस्तान के पास इस शर्मनाक स्थिति से बचने का एक ही चारा बचा था और वह यह कि जब तक वह बदला ना लेले इस घटना को झुठलाता रहे। इसी रण-नीति पर अमल करते हुए पाकिस्तान उस झूठ के तिनके को पकड़े हुए है और यही कह रहा है कि भारत केवल दुषप्रचार कर रहा है कि उसने पाकिस्तान पर सर्जिकल ऑपरेशन किया है। उसके इस प्रयास में कुछ निकृष्ट भारतीय तत्व भी शामिल हो गए हैं जो किसी भी अवसर पर अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने से बाज नहीं आते। किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है इस शल्य चिकत्सा की सत्यता प्रमाणित होती जारही है। केजरीवाल, चिदांबरम, दिग्विजय, संजय निरूपम जैसों की तो बात नहीं करता किन्तु पाकिस्तानी राष्ट्र को ख़ासी बेचैनी हो रही है। इस पूरे प्रकरण में पाकिस्तान फिर एक नए षड्यंत्र की तरफ आगे बढ़ रहा है। यह षड्यंत्र अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और भारत को भ्रमित करने के उद्देश्य से खेला जा रहा है।

क्या है यह षड्यंत्र :-

पाकिस्तान में हर हाल में मूल सत्ता सेना के पास रहती है। वहाँ सेना की इच्छा से ही प्रजातन्त्र चलता है। पाकिस्तानी जनता का शोषण करने में ये दोनों धड़े एक दूसरे को पूरा सहयोग करते हैं। पाकिस्तान जब भी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में ऐसी शर्मनाक स्थिति में आता है ये दोनों धड़े विश्व समुदाय की आँखों में धूल झोंकने के उद्देश्य से आपस में नूरा-कुश्ती में उलझ जाते हैं। नूरा-कुश्ती वह दिखावटी कुश्ती है जिसमें दोनों पहलवान एक-दूसरे को चोट नहीं पहुँचाते हैं और जनता को मूर्ख बनाते रहते हैं।

पाकिस्तान के ये दोनों धड़े इस खेल में सिद्धहस्त हैं। अमरीका में 09/11 के आतंकी हमलों के बाद से और अफगानिस्तान में तालिबानियों के साथ तक ये दोनों आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई के नाम पर अमरीका को दुहते रहे। विश्व समुदाय ने जब पाकिस्तान को अवैध परमाणु व्यापार में पकड़ा तो पाकिस्तान ने सारा दोष अब्दुल कादिर के सर रख कर अपने को किनारे करने का प्रयास किया। ओसामा से लेकर मुल्ला मंसूर तक इसके आंगन में पड़े रहे। जब जैसी जरूरत पड़ी दोनों धड़े एक दूसरे के ऊपर कीचड़ उछाल कर यह दिखलाने की कोशिश करते के उनमें परस्पर खींच-तान है।

इस से विश्व जनमत में दो फाड़ हो जाता था। एक कहता, पाकिस्तान में प्रजातन्त्र को मजबूत करने की आवश्यकता है तो दूसरा कहता कि वहां के राजनेता भ्रष्ट हैं, वहां सेना को सत्ता में बने रहना चाहिए। इस स्थिति में जो असली मुद्दा होता, वह गायब हो जाता। पाकिस्तान इस बार भी विश्व समुदाय के सामने यह खेल दुहराना चाहता है।

पाकिस्तानी नूरा-कुश्ती का विज्ञापन :-

06 अक्तूबर को डॉन समाचारपत्र ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए लिखा कि पाकिस्तान सरकार और सेना के अधिकारियों के बीच 4 अक्तूबर को एक गुप्त बैठक हुई। इस बैठक में विदेश सचिव एजाज चौधरी ने एक रिपोर्ट पेश की। इसमें ऐसी बातें कही गईं, जो पाकिस्तान के वजूद पर खतरे की बात थीं। समाचारपत्र के मुताबिक विदेश सचिव ने इस बैठक में बताया कि पाकिस्तान दुनिया में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। दुनिया के ज्यादातर देशों में पाकिस्तान की बातों और दलीलों पर यकीन नहीं किया जा रहा है। ऐसे में दुनिया के सामने हमें कुछ ऐसा करना होगा, जिससे पाकिस्तान का वजूद बचाया जा सके। ऐसे में इस बैठक में फिर वही फैसला लिया गया जो पाकिस्तान का इतिहास रहा है। सरकार की तरफ से सेना और आईएसआई को फरमान जारी किए गए, लेकिन पाकिस्तान में सेना और आईएसआई कभी ऐसे फरमानों को नहीं मानती है। रिपोर्ट में ऐसा भी उल्लेख रहा कि बैठक के दौरान पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ जो नवाज शरीफ के भाई हैं, ने आईएसआई और सेना पर गंभीर आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा कि जब भी पुलिस या प्रशासन आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई कदम उठाता है तो सेना और आईएसआई के लोग दबाव डालते हैं। शाहबाज शरीफ के इस आरोप के बाद बैठक में काफी हंगामा हुआ। इसके बाद ये तय किया गया कि आईएसआई चीफ लेफ्टिनेंट जनरल रिजवान अख्तर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नसीर जांजुआ देश के चार प्रांतों का दौरा करेंगे। जहां दोनों इन प्रांतों के आईएसआई कमांडर से बात करेंगे, जिन्हें ये निर्देश दिया जाएगा कि वो प्रशासनिक कार्रवाइयों में दखल नहीं दें। आईएसआई चीफ ने नवाज सरकार को दो टूक शब्दों में कह दिया कि ऐसे वक्त में अगर हम कार्रवाई करते हैं तो यही संदेश जाएगा कि यह ध्यान दिए जाने योग्य बात है कि पाकिस्तानी समाचारपत्र आज तक पाकिस्तानी सेना के भय से भारतीय सर्जिकल रिपोर्ट का विश्लेषण नहीं छाप सके हैं वे सेना और प्रधानमंत्री के टकराव की बात को इतनी प्रमुखता से कैसे प्रकाशित कर सकते हैं?

सेना और प्रधानमंत्री के मध्य झूठे टकराव की स्थिति को विश्व समुदाय को परोस कर पाकिस्तान प्रेस की सहायता से विश्व जनमत को विभाजित करने का प्रयास कर रहा है। विशेषकर वह भारत से भी यह चाहता है कि वह इन बातों पर यकीन कर ले और पाकिस्तानी बदले से सचेत मुद्रा को छोड़ दे जिस से पाकिस्तान को बदला लेने में आसानी हो सके।

अमरीका में घुस कर अमरीका को ही गीदड़ भभकी :-

अमरीका से एक-एक डॉलर की भीख मांगनेवाले पाकिस्तानी सीनेट के दो सदस्यों जिन्हें नवाज़ शरीफ ने अमरीकी जनमत को कश्मीर के प्रति पाकिस्तान के पक्ष में करने केलिए अमरीका भेजा हुआ है, ने कश्मीर के प्रति अमरीकी उदासीनता को देख अमरीका की ही पगड़ी उछालनी शुरू करदी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के दूतों ने कहा कि अमेरिका ‘‘अब वर्ल्ड पावर नहीं है’’ और यदि कश्मीर और भारत के संबंध में पाक के विचारों को तवज्जो नहीं दी जाती है तो वह चीन और रूस का रुख करेगा। कश्मीर मुद्दे पर शरीफ के विशेष दूत मुशाहिद हुसैन सैयद को अमेरिका के शीर्ष थिंक टैंकों में शामिल ‘अटलांटिक काउंसिल’ में चर्चा के समापन के बाद कल यह कहते सुना गया, ‘‘अमेरिका अब वैश्विक शक्ति नहीं है। वह घटती हुई शक्ति है। उसके बारे में भूल जाओ।’’

पाकिस्तान की कश्मीर नीति को तवज्जो नहीं मिलने के बीच सैयद ने कहा कि चीन अब दक्षिण एशिया में एक महत्वपूर्ण कारक है। उन्होंने पाकिस्तान और रूस के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘मॉस्को और इस्लामाबाद के संबंध लगातार विकसित हो रहे हैं। पुतिन सरकार पाकिस्तान को हथियार बेचने के लिए पहली बार सहमत हुई है और अमेरिका को इस बदलते क्षेत्रीय समीकरण पर ध्यान देना चाहिए।’’

पाकिस्तान से निरंतर सतर्क रहने की आवश्यकता :-

भारत के सर्जिकल ऑपरेशन के बाद पाकिस्तानी संसद के दोनों सदनों की हुई आपात बैठक को संबोधित करते हुए नवाज़ शरीफ ने एक बार फिर मारे गए कश्मीरी आतंकी वानी की शान में कसीदे पढ़े और दो दिन बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने ज़ोर देकर कहा कि जिसने भी पाकिस्तानी सीमा का उल्लंघन किया है उसे दंडित अवश्य किया जाएगा। ऐसी स्थिति में निश्चित तौर पर भारत को पाकिस्तान की हर गतिविधि पर निगाह बनाए रखने की आवश्यकता है।

(नोट- यह लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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(सुधेन्दु ओझा)