इस साल चला समाजवादी परिवार में बिखराव और मिलाप का दौर

नई दिल्ली। इस साल समाजवादी पार्टी में दंगल का नजारा देखने को माह जून से ही शुरू हो गया। जब शिवपाल ने मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का विलय कराया । लेकिन इसके बाद परिवार से लेकर पार्टी के भीतर जमकर सियासी घमासान मचा। अखिलेश ने कार्रवाई की तलवार खींच दी।

कईयों पर गाज गिरा दी। चाचा शिवपाल का विभाग छींन लिया। नाराजगी का पारा इस कदर चढा कि सपा सुप्रीमों को आनन-फानन में संसदीय दल की मीटिंग बुलाकर पार्टी का विलय रद्द करना पड़ा।

कौमी एकता के विलय से शुरू हुआ विवाद

अखिलेश की इस कार्रवाई में गायत्री समेत कई बड़े चेहरों की रंगत उड़ गई थी। लेकिन परिवार में खिंची सियासत की तलवार आखिरकार बातचीत के बाद म्यान में चली गई। लेकिन दिलों में आई टीस बाकी थी। फिर अक्टूबर में एकाएक पार्टी में फिर शुरू हुआ दंगलों का दौर ये दौर। बार बार बाहरी आदमी के तौर पर कहे जाने वाले अमर सिंह की पहले तो मुलायम ने पार्टी का महासचिव बना दिया। फिर अपने ही बेटे के सिर से प्रदेश अध्यक्ष का ताज छींन लिया गया।

कार्रवाईयों इस्तीफे और निष्कासन का दौर चला

फिर शुरू हुआ समाजवादी परिवार में कार्रवाईयों इस्तीफे और निस्कासन का दौर। कभी शिवपाल कार्रवाई की तलवार चलाते तो कभी सपा सुप्रीमों आखिरकार अखिलेश ने सबको दरकिनार करते हुए, कार्रवाईयों की झड़ी लगा दी। फिर तो चाचा शिवपाल से उनका मंत्रालय और मंत्री पद तक लेकर अपनी ताकत का अहसास करा दिया। इसके बाद फिर मीटिंगों का दौर सपा सपा में शुरू हुआ। जिसके बाद एक बड़ी कार्रवाई करते हुए पार्टी के थिंक टैंक रामगोपाल को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

सियासी दंगल का पहला चक्र

इसके बाद समाजवादी कुनबे में बिखराव का दौर बड़े पैमाने पर था। अटकलें लगाई जाने लगी थीं, कि अखिलेश अलग पार्टी बना सकते हैं। फिर मीटिंगों के दौर में अखिलेश और शिवपाल समर्थकों की झड़पें और पोस्टर वार सूबे की राजधानी से लेकर हर जिलों में दिखने लगे । पार्टी ने प्रेस कर समाजवादी परिवार के विवाद पर पटाक्षेप करने की कोशिश की लेकिन मंच पर हुए सियासी ड्रामें ने चाचा और भतीजे की दूरियां लोगों तक साफ पहुंचा दी।

सुलह हुई परिवार के बीच

फिर बिचौलियों ने समझौते की कोशिशे की बातचीत का दौर चला अखिलेश की रथयात्रा से सुलह का दौर सामने आया। पार्टी की स्थापना दिवस पर सारा समाजवादी कुनबा साथ में एक मंच पर खड़ा था। लग रहा था कि बीते दिनों चले और मचे घमासान का युग अब खत्म है। पार्टी चुनाव में नई ताकत के साथ जाने को तैयार है। लेकिन दंगल पार्ट -2 का आगाज होना अभी बाकी था। सूबे की सियासत में चाचा-भतीजे के इस रोचक मुकाबले की सुगबुगाहट चलती रही कभी पोस्टरों के जरिये तो कभी रैलियों में बिखराव के जरिये।

समाजवाद के दंगल का पार्ट-2

लेकिन अब(जࡈे जैसे इस साल की अंतिम बेला करीबी आती जा रही थी। उसकी के साथ समाजवादी परिवार में दंगल को लेकर तैयारियां तेज हो गई थीं। शिवपाल ने अपने उम्मीदवारों की सूची सपा सुप्रीमों को सौंप इस दंगल में मुलायम को लेकर उतरने का मन बनाया। मुलायम ने सूची जारी करते हुए अखिलेश के करीबियों के ही टिकट काट दिये। लेकिन इसके बाद फिर सूचियों के दौर शुरू हो गये। कभी मुलायम की सूची तो कभी शिवपाल की सूची तो फिर अखिलेश की सूची, सूबे की 403 सीटों के लिए समाजवादी पार्टी के दंगल पार्ट-2 में तकरीबन 574 उम्मीदवार बन गये। अब ये दंगल इस करवट बैठेगा। लेकिन ये साफ हो गया। समाजवाद से परिवारवाद की राजनीति अब सियासी दंगल में उलझ गई है।

फिर हुई बड़ी कार्रवाई

लेकिन कुश्ती से राजनीति का सफर तय करने वाले मुलायम सिंह ने इस सियासी दंगल में शिवपाल के सहारे पहले तो सीएम अखिलेश को नोटिस भेजते हुए कारण बताने को कहा फिर आधे घंटे बाद पार्टी कार्यालय में जाकर प्रेस कॉफ्रेंस कर पहले रामगोपाल को पार्टी से गलत बयानबाजी करने पर बाहर करने की बात कही इसके बाद सबसे बड़ा ऐलान करते हुए अखिलेश को भी पार्टी से बाहर कर दिया जिसके बाद प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया। इसके बाद लगातार मीटिंगों का दौर अखिलेश और मुलायम दोनों कैम्पों में विचार विमर्श का दौर शुरू हो गया है।

फिर सुबह होते होते पूरे प्रदेश का राजनीतिक माहौल गरम था। सुलह की और समझौते की कोशिशें होने लगी। वार्ताओं का दौर चला करीबियों ने दोनों पक्षों को एक साथ एक मंच पर लाने की कवायद तेज की आखिरकार समझौते की नींव रख उठी। अखिलेश और रामगोपाल की वापसी फिर हो गई। इसी के साथ इस समाजवादी दंगल का अंत साल के अंत में हो ही गया।

अजस्रपीयूष