यूपी में लोकसभा चुनाव जैसा इतिहास रच पायेगी भाजपा ?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और सियासी दल इस महाकुम्भ में जीत की डुबकी लगाने के लिए तैयारियां कर चुके हैं। प्रदेश में 7 चरणों में होने वाला विधानसभा चुनाव अपने-आप में बेहद खास होने वाला है। इन चुनावों को सपा में संग्राम के लिये जरूर याद किया जायेगा। इन चुनावों में एक बार फिर से कई प्रतिष्ठित नेताओं की शाख दांव पर लगी हुई है।

उलझ गए विरोधी

एक तरफ राजनेताओं की शाख दांव पर लगी हुई तो दूसरी तरफ बिहार चुनावों की तरह ही इन चुनावों मे भी एक बार फिर से सभी पार्टियों के निशाने पर बीजेपी ही है। सभी दल बीजेपी को कभी नोटबंदी तो कभी किन्ही और कारणों से सवालों के कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। बीजेपी रण में बाजी ना मार जाए इसके लिये सभी सेक्युलर ताकतें एक होने में लगी हुई है लेकिन सभी पार्टियां अपने आप में इतनी उल्झी हुई है कि वो एक नहीं हो पा रही है।

बाकियों को दरकिनार कर अगर यूपी में बीजेपी की सत्ता आने की बात की जाये तो साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 403 विधानसभा सीटों में से 328 यानी 81% पर जीत हासिल कर 71 संसदीय सीटों पर जीत दर्ज की थी। इससे पहले अन्तिम बार 1977 में आपातकाल के बाद जनता पार्टी ने सूबे की 80 फीसदी विधानसभा सीटों पर कब्जा बनाया था। इस तरह बीजेपी ने 2014 में एक रिकार्ड बनाया।

खास बात है कि वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा ने 403 सीटों में से 253 पर 40 फीसदी से ज्यादा अंतर से जीत दर्ज की थी। यानी अगर पूरा विपक्ष एक जुट हो जाता है तब भी बीजेपी आधे से अधिक सीटें जीतकर यूपी का रण अपने नाम करने में सक्षम है। सियासी आंकड़ो पर नजर डालें तो पता चलेगा कि प्रदेश के किसी भी दूसरे दल ने प्रदेश में इतने बड़े अंतर से इतनी ज्यादा सीटें नहीं जीती हैं। इस लिहाज से अगर तीन साल पुराने इस पूरे रिकार्ड पर नजर डालें तो इस बार भी बीजेपी पूर्ण बहुमत वाली सरकार की स्थिति में होगी।

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क्या कहते हैं राजनीतिक विशेषज्ञ

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 200 से कम सीटें मिलती हैं, तो इसका सीधा अर्थ होगा कि वर्ष 2014 में पार्टी को वोट देने वाले ज्यादातर मतदाताओं ने अपना मन बदल लिया। इसके साथ ही चुनावी इतिहास में इस तरह वोटों का एक पक्ष से दूसरे पक्ष में जाना अपने आप में बहुत बड़ा मामला होगा। राजनैतिक विश्लेषक केन्द्र सरकार के कामकाज के आधार पर इतना बड़ा फेरबदल होना असम्भव मान रहे हैं। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार पर अभी तक भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं लगे हैं। सरकार और उसके मंत्रियों की छवि क्लीन है इसलिए इतना बड़ा परिवर्तन होने की उम्मीद नहीं है।

अब अगर इसके विपरीत उदाहरण वाले बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो साल  2014 में वहां भी धमाकेदार प्रदर्शन करने के बावजूद पार्टी इसलिए चुनाव हारी क्योंकि महज 4 फीसदी मतदाताओं ने भाजपा के खिलाफ महागठबन्धन की ओर रूख कर लिया। यूपी की इससे तुलना करें तो यहां भी विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ कुछ ऐसा माहौल बनाना होगा।

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मोदी भी दिखा रहे दिलचस्पी

इसके साथ ही पार्टी विधानसभा चुनाव को लेकर इतनी गम्भीर है, कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं। यह सिर्फ विधानसभा चुनाव नहीं है, बल्कि उस राज्य का विधानसभा चुनाव है, जहां से वह स्वयं सांसद हैं। वह खुद कह चुके हैं कि उनको प्रधानमंत्री बनाने में यूपी का सबसे बड़ा हाथ है।

ऐसे में पार्टी यूपी का किला फतेह करने के लिए हर तरह की रणनीति पर काम कर रही है। नोटबन्दी के मुद्दे पर प्रधानमंत्री लगातार जनता से संवाद करके यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि यह आम जनता के हित में लिया गया निर्णय है। वह कांग्रेस, सपा और बसपा के हर आरोपों का जवाब दे रहे हैं, साथ ही उनकी सरकारों की कमियों को जनता के सामने रख रहे हैं, जिससे भाजपा वास्तव में यूपी में परिवर्तन लाने में सफल हो। आचार संहिता लगने के बाद अब भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की पूरी फौज यूपी के महासमर में देखने को मिलेगी। पूरा संगठन अपनी रणनीति को सफल बनाने में पहले से ही जुटा है, अब देखना है कि पार्टी की ये पूरी कवायद उसको कितना लाभ पहुंचाती है।

 आशु दास